Badaun News : बदायूं की फिजाओं में इन दिनों चुनावी इत्र की खुशबू कम और श्रेय लेने की होड़ ज्यादा दिखाई दे रही है। जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव की आहट नजदीक आ रही है, सोए हुए जनसेवक अचानक हनुमान की तरह अपनी शक्तियां याद कर जाग उठे हैं। साल भर भले ही विकास के नाम पर सन्नाटा पसरा रहा हो, लेकिन अब घोषणाओं और शिलान्यासों की ऐसी गंगा बह रही है कि आम जनता को डूबने का डर सताने लगा है। गद्दी बचाने की इस जद्दोजहद में अब अपनों के बीच ही क्रेडिट वॉर का दंगल शुरू हो गया है।
बदायूं में विकास कार्यों का श्रेय लेने की राजनीति ने अब नया और दिलचस्प मोड़ ले लिया है। पहले तो बदायूं से दिल्ली रेल कनेक्टिविटी को लेकर लड़ाई पक्ष और विपक्ष के बीच सीमित थी तब तो समझ आता था कि सियासत के दो किनारों में टकराव है। लेकिन अब तो घर के भेदी ही लंका ढाने को तैयार हैं। मामला है पीपीपी मॉडल पर बनने वाले अत्याधुनिक रोडवेज बस अड्डे की कैबिनेट मंजूरी का।
इसे नियति का खेल कहें या चुनावी दबाव, एक ही दल के दो दिग्गज नेता इस बस अड्डे को अपनी निजी उपलब्धि बताने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। सोशल मीडिया से लेकर होर्डिंग तक, दावे ऐसे किए जा रहे हैं मानो बस अड्डे की एक-एक ईंट इन्हीं की सिफारिश पर रखी जा रही हो। मुहावरा तो एक अनार सौ बीमार का है, पर यहां स्थिति एक अनार दो बीमार वाली हो गई है।
हैरानी की बात यह है कि जब साल भर जनता धूल और धक्कों में सफर कर रही थी, तब यह विकास के नायक मौन थे। अब चुनाव करीब देख विकास की झड़ी लगा दी गई है ताकि अगले पांच साल की सत्ता सुरक्षित हो सके। लेकिन पार्टी के भीतर ही श्रेय लेने की यह खींचतान सेल्फ गोल साबित हो सकती है। यदि एक ही दल के दो सिपहसालार आपस में भिड़ेंगे, तो जनता का भ्रमित होना स्वाभाविक है। श्रेय की यह रार कहीं आगामी चुनाव में पार्टी की चुनावी गाड़ी का टायर पंक्चर न कर दे। नेताओं को समझना होगा कि जनता काम देखती है, केवल कागज पर लिया गया 'क्रेडिट' नहीं।

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